Back to DirectoryOfficial Transcript

अहंकार का गूढ़ रहस्य !! The Deep Secret of the Ego

Overview

अहंकार का गूढ़ रहस्य !! The Deep Secret of the Ego

Full Transcript

सुधा माता जी : प्रणाम सबको प्रणाम प्रणाम प्रणाम भोले बाबा प्रणाम प्रभु जी प्रणाम

प्रभु जी : आपकी आज की अध्याय में जितने भी ग्रंथि है पहले ग्रंथि का ले ठीक है धारणा समस लोभ ईर्ष्या डा प्रेम करुणा ये जो सारे ग्रंथियां है ये सारे ग्रंथियां देवी देवता है ठीक है लेकिन ब्रह ब्रह्मा विष्णु और महेश देवी देवता नहीं है। वो देवी देवता का निर्माण करता है। निर्माण करता और इसीलिए विष्णु वो अहंकार ग्रंथि है। है ना? अब अहंकार क्या है? अब इसको समझ लेते हैं। अब सारे चीज लोभ, ईर्ष्या, डाह, माया, प्रेम, करुणा ये सारे चीज तो हमारे दिनचर्या में आ जाती है। तो ये हो गया हमारे देवी देवता है ना कुछ का ऊर्जा अभी पकड़ रहा है। अब एकदम पावरफुल आ गया। हनुमान का ऊर्जा पकड़ रहा है। है ना? अगर शिव को मानते हो तो रुद्र का वो पकड़ रहा है। इस तरीका से वो लेते हैं। मतलब अपनीप ऊर्जा के हिसाब से अपनीप देवी देवता में चले जाते हैं। और रह गए अहंकार। अब अहंकार को समझ जितनी जितनी ऊपर बढ़ेंगे उतना उतना समझ बढ़ेगा। अब भाषा में शब्द में प्रयोग करने से अहंकार का अर्थ क्या है? जो आप खुद को समझते हो वो आप नहीं हो। अगर आपको खुद मैं कर रहा हूं बोल रहे हो तो अहंकार है। आप नहीं कर रहे हो बोल रहे हो। खुद परमात्मा करवा रहे बोल रहा है तो आप अहंकार रहित हो। परमात्मा ही कर रहा है। ऐसा हम शब्द में व्यक्त करते हैं। लेकिन अनुभव में स्तर के हिसाब से आ जाता है। जैसे संसार में जो जीते हैं अब उनको अहंकार क्या लगता है? अपने आप को बड़ापन दिखाना है ना कुछ तो ऐसा करना वो करना ये करना बातें करना ये सारे चीज को लेते हैं अहंकार संसार में जब हम अध्यात्म में आ जाते हैं तब समझ जाते हैं ये तो हमारे स्वभाव है है ना स्वभाव अच्छा होना चाहिए वो जो अभी माता जी बोली थी बीच का रास्ता तटस्थ तटस्थ क्या है ना इधर का ना उधर का जो अभी जो है सही है वही है वो है तटस्थ बीच का रास्ता एकदम सीधा शॉर्टकट रास्ता यही रास्ते का भी आपने जिक्र किया था रजि जब हम अध्यात्म में चलते हैं तब यह बात भूलकर हम अहंकार को खुद को अहंकार है मैं अहंकार हूं। अब उस पर लगते हैं। तो समाधि से पहले जितने भी अब वो समझता है परिभाषा के ऊपर उसको अहंकार समझ आया तो उसको हो गया शब्द ज्ञान। उस शब्द से अब जब भी वो मन के शब्द में अपना अहंकार गिराते रहता है। अब जब समाधि घटती है समाधि घटने के बाद क्या होती है? हर एक शब्द का ज्ञान हो जाता है। शब्द ज्ञान होता है। तब उसको समाधि में ये बात भी पता चलता है जो मैं असली स्वरूप था ये शरीर वो तो शरीर ओनली नहीं हूं। मैं तो अलग सा रूप हूं। ये तो ऊर्जा स्वरूप हूं। ये ऊर्जा है। अब उसको वो समझ आया। तब उसका वो अहंकार का दूसरा रूप समझ आया और वो डेंजर रूप समझ आया। अब वो समझेगा मैं ऊर्जा हूं। अब ये छोड़ो ये संसार का ये तो छोड़ो मैं तो ऊर्जा स्वरूप हूं। मैं तो भगवान हूं। मैं जान गया पहचान गया मैं अहंकार। अब मैं है ही नहीं। वही ऊर्जा है। बोलता है लेकिन वो ऊर्जा को नहीं खुद महसूस कर रहा है वहां पे। अभी भी अहंकार वहां पर भी नहीं गिरा होता है क्योंकि कहीं ना कहीं जाके उसका एक पहलू में वह ऊर्जा भी तो मैं ही हूं और वो शक्ति स्वरूप ऊर्जा है उसी ऊर्जा हूं मैं क्योंकि मुझे समाधि घटी मैं ऊर्जा हूं हो गया हूं ऊर्जा में ये आ जाता है अब ये ऊपर स्तर का है अब उसमें तो नहीं आएगा मैं कर रहा हूं मैं कर रहा हूं उसको नहीं आएगा कभी भी नहीं बोलेगा वो मैं कर रहा हूं नहीं वो करवा रहा है बोलने लगेगा ऑटोमेटिक नहीं बोलने लगेगा ऐसा लेकिन बोलकर कर भी वो ऊर्जा स्वरूप भी खुद को मान रहा है तब या फिर एक पहलू रह जाती है ये और डेंजर है क्योंकि यहां पे सिद्धिया शुरुआत होती है यहां पे ब्रह्मचर्य साधना शुरू होती है यहां पे कल्पव से शुरू होती है यहां पे कुंडलिनी शुरू होती है सब कुछ जो इतना अध्यात्म को जो कुछ भी बताया गया है सारे कुछ अब यहां से निकलना शुरू होता है अब निकला ऐसा चीज अगर आप सही चीज में नहीं हो तो फिर वही चीज ले जाके उधर करेगा अब जो वो अच्छा करेगा, बुरा करेगा उसके लिए कुछ भी नहीं है। बस उसको निकलना है। बाहर निकलना है। बाहर निकलना अर्थ आपकी कृति से निकलेगा वो। अब ये क्या किया वो क्या किया वो किया वो आपकी बातें में पड़ जाएगा। तो इसलिए समझ जाइए यहां पे भी अहंकार। अब जब वो पूर्ण अहंकार कब गिरेगा? जब वो दर्शन होगा तभी गिरेगा पूर्ण अहंकार। उससे पहले ऊर्जा स्वरूप अहंकार समझ में आएगा और मैं नहीं कर रहा हूं समझ में आएगा। ऊर्जा ही करवा रहा है। वही दिया था। उसी ने करवाया वो समझ आता है। लेकिन एक पहलू में वो ऊर्जा भी तो मैं ही हूं। वो आ जाता है। क्या क्या समझ आया बताइए?

सुधा माता जी : प्रभु जी। फिर वो ऊर्जा का अहंकार हो जाता है। यह तो मैं हूं। मैं यह मैं नहीं कर रहा। ये तो ऊर्जा ही करवा रही है।

प्रभु जी : वही है वही है। वही कहना था। है ना? आगे बढ़ के ये समस्या ये हो जाता है।

सुधा माता जी : ये उससे भी बड़ा अहंकार हो जाता है। हां सही समझ पाई ना मैं?

प्रभु जी : यही सुधा माता जी बोलिए बोल लीजिए आप बोल लीजिए

सुधा माता जी : हां जी मैं पता नहीं क्या बोल मैं ये बोल रही थी कि कुछ चीज हमारे जैसे कि अंदर से हमें खुशी होती है ना कुछ काम किया हमने हमें अंदर से खुशी होती है ना तो वो तो हमें पता चल गया कि हमने अच्छा किया है कुछ ना और ऊर्जा ने करवाया है मतलब हमने नहीं करा ऊर्जा ने करवाया है लेकिन हमारे मन से मतलब कुछ हमसे कुछ गलत हो गया है और हमारा मन दुखी हो रहा है कि नहीं यह नहीं होना चाहिए था ना तो वो फिर वो वो तो फिर झेलना ही पड़ेगा ना वो तो गलत हो गया है उसमें ऊर्जा का कुछ नहीं है मतलब ऐसा कि ऊर्जा करवा रही है हम नहीं बोल सकते हैं कि ऊर्जा करवा रही है उसको हमें झेल मिलना है मतलब हां जी प्रभु जी

प्रभु जी : हां इसको थोड़ा और दूसरे एंगल से समझ लेना ठीक है सब चीज ऊर्जा ही है

सुधा माता जी : हां

प्रभु जी : है ना ऊर्जा का अपना रास्ता होता है

सुधा माता जी : हां जी

प्रभु जी : और हम वो ऊर्जा जहांजहां बहता है वहां वहां हमने बीज डाले होते हैं

सुधा माता जी : हां हां हां

प्रभु जी : अब बुरी ऊर्जा के रास्ते में आप जा रहे हो तो बुरी ऊर्जा का बीज डाल रहे हो तो बुरे तरीका से आपको बाद में तो भोगना ही पड़ेगा। वो भी तो बुरा भी तो ऊर्जा ही था। भगवान ने ही करवाया।

सुधा माता जी : हां जी। हां।

प्रभु जी : नहीं समझ रहे हो? अगर अस्तेरस्ते से चल रहे हो तो अस्तेरस्ते में फिर आप बीज डाल के चल रहे हो।

सुधा माता जी : हम

प्रभु जी : अब अस्तेरस्ते में बीज डाल के चल रहे हो तो फिर आपको तो अच्छा अच्छा मिलेगा।

सुधा माता जी : हां। वो तो प्रभा तो दोनों ऊर्जा वही है ना। राम भी वही है रावण भी वही है। हां। पर हम मतलब उसमें है प्रेजेंट में है हम

प्रभु जी : पहले ऊर्जा को तो समझ में आया ना ऊर्जा को अगर इतना समझ आया तो आपको पाप और पुण्य क्या बोलते हो ना पाप लगता है कि नहीं लगता बोलते हो आपको समझ में आ जाएगा क्या पाप है क्या पुण्य जो ऊर्जा की में गया तो वो ऊर्जा को जिस तरह करेगा तो आपने अगर अगर दारू पी ली तो आपको चढ़ेगा। ये तो प्राकृतिक नियम है। उसी तरह ऊर्जा का प्रभाव के हिसाब से प्राकृतिक अपने नियम में बीज डालते जाता है। उसी तरह होते ही जाता है और करना ही पड़ता है। पड़ता है। है ना? ये हो गया पाप और पुण्य और ऊर्जा के साथ।

सुधा माता जी : जी जी। अब हम किस रास्ते से जाए? कभी तो हमको झगड़ा भी करना पड़ता है। अब हमको तो समझ नहीं आ जाता है ये अच्छा है ये बुरा है। तो हम इस बात को कैसे समझे? ये बात को ऐसे

प्रभु जी : समझे कि आप अगर धैर्य में हो अगर खुद को देख पाते हो कि मैं अभी फाइव डी में सच में हूं। आपको लगे तो वो है ब्रह्म करवा रहा है। अगर आपको कहीं हड़बड़ मन बुद्धि चल रहा है। सोच आ रहा है, विचार आ रहा है और उसके बाद ये ये बहुत सारे परेशानी आ रहा है। आप खुद भी अच्छे स्थान हो तो समझ लेना आप उसकी दस्त में गए। हम्म हम्म हम जी

सुधा माता जी : समझा? हां जी। हां।

प्रभु जी : आप पकड़ सकते हैं मन बुद्धि से करेंगे तो ऊर्जा करवा रहा है या आपका ऊर्जा करवा रहा है अब पता चलेगा मन बुद्धि वाला ऊर्जा करवा रहा है गलत है ना और वो भाव वाला फाइव डी वाला करवा रहा है जो अच्छा करवा रहा है

सुधा माता जी : हां और हम क्या समझते भी है कि एक बार अगर

प्रभु जी : वहां पहुंच गए जैसे 5 डी को हम जान गए और हम पहुंच गए तो हमको क्या लगता है कि अब तो पहुंच गए तो हमारे सारे ऊर्जा फाइव का ही है ब्रह्म का वही करवा रहा है ये भी समझ आता था ये भी गलत है और दूसरी समझ और हमको अध्यात्म आगे बढ़ने का गलत समझ और दूसरा है कि मैं उस दिन भी एक सत्संग में बताया था कि हम लोग क्या समझते हैं कि जो कहानी में भगवान के बारे में सुने हो ना हम ज्ञान प्राप्त करने के बाद वैसे ही होंगे सोचेंगे

सुधा माता जी : जी

प्रभु जी : तो वहां पे गड़बड़ और कोई ज्ञानी है तो फिर वो वैसे ही होना पड़ेगा सोचेंगे तो फिर वहां पे अब नहीं मिला मतलब प्रैक्टिकल होना चाहिए होना चाहिए हां आप जैसा है वैसा ही है वो बस चेतना खुला बस उसको पता चला

सुधा माता जी : जी

प्रभु जी : पता चलने के बाद भी क्या पता चला वही था हमको तो पहले से पता था ये सारे हम संसार में जी गए तो भूल गए बस उतना ही हम और कुछ अलग से पता चलता है ये जानने का कोई जरूरत है नहीं जितना ये मनुष्य के दिमाग में कचर पचर में जानने का है वो अपने तीन नहीं है हम

सुधा माता जी : जी

प्रभु जी : वो दिनचर्या को तो ऐसे जानता है वो हम हम अपनी दिनचर्या से आगे कुछ करते हैं नहीं कहां करते हैं वही दिनचर्या ही करते है ना कुछ भी करो पढ़ो ध्यान करो भगवान की स्मरण करो वो दिनचर्या में चलता रहता है आप करो या कर क्या कर मतलब हम वैसे तो हम 3 डी में ही जीते हैं। हर समय 3 डी में ही जीते हैं। लेकिन 5 डी में जाने के लिए जैसे हम माना कहीं पर हम रास्ते चल रहे हैं तो हमें वहां पर ध्यान देना चाहिए कि आगे रास्ता टूटा तो नहीं है। कांटे तो नहीं है हमारे रास्ते में ना विष्णु आ जाएगी फिर और आपको अच्छा अच्छा लॉजिक देके फिर हां ठीक है ये करके जस्टिफाई कर देगी आपको। ठीक है? हां जी ये भी और भी है मतलब ये जस्टिफाई करके आपको हां करके लगेगी वो फाइव का समझने के लिए पहले आप धैर्य को पकड़ना है धैर्य को पकड़ने पाने के बाद अभी उस टाइम आपको जज खुद करना है वो सेकंड भी नहीं लगेगा नैनो सेकंड में पता चलेगा कि आप धैर्य में हो की फाइव डी में हो की 3D में हो आपको उसी टाइम पता चलेगा और आप 3D में जाओ उधर के बीच क्योंकि ब्रह्मांड में आपके लिए सब छूट

सुधा माता जी : हां जी ठीक ठीक है प्रभु जी ठीक प्रभु जी प्रणाम माया तो प्रभु जी हमारे साथ 24 घंटे रहती

प्रभु जी : है लेकिन हमें होश में धैर्य में रहकर विवेक से सोचना पड़ता है कि हम क्या कर रहे हैं क्या करने जा रहे हैं हर क्षण हमें सोच के करेंगे फिर वो तो वो बिगड़ जाएगी ना वैष्णवी कह रहे तो आपकी ये विष्णु माया माया भी विष्णु जो है आपकी सोच को फिर अच्छा अच्छा करके नहीं लेके आएगा सोच के अगर करेंगे तो क्या पता कि अभी सोच के आपको एक सोच उसको झापड़ मारना है अब एक सोच आपको जस्टिफाई करेगा उसको झापड़ मारो और फिर दूसरी सोच आपको जस्टिफाई करेगा नहीं उसको झापड़ मत मारो

सुधा माता जी : जी

प्रभु जी : हो जाता है ना

सुधा माता जी : जी और आप जैसे चाहते हो विष्णु माया उसी तरीका से आपको जस्टिफाई करके ले जाएगा क्योंकि जस्टिफाई जिधर भी होता है फिर वो झापड़ मारने का रीजन भी बताता है भी बताता है मारना गलती किया तो मारने में मारना तरफ

प्रभु जी : इसको पकड़ने का रास्ता वही तो बता रहा हूं धैर्य पकड़ो फाइव डी को जानो और देखो खुद फाइव डी में हो या नहीं बस इससे कोई है धैर्य में धैर्य में रहकर ही पकड़ना पड़ेगा हां धैर्य में रहो हो और फाइव डी की अवस्था को जानो और उस अवस्था में हो या नहीं पकड़ना और नहीं हो तो थोड़ी देर में वो अवस्था में आने का प्रयत्न करना और डिसीजन करना

सुधा माता जी : जी

प्रभु जी : तब मैं भी विष्णु आपको नहीं वो करेंगे समझ में आया

सुधा माता जी : जी माता जी जी समझ में आया

प्रभु जी : मैं भी विष्णु भी भगवान ही है हां वही तो चक्कर है ना कि माया भी तो वही है ले लो भैया यही तो चक्कर है माया ने चारों तरफ से घेर रखा है विष्णु जी ने

सुधा माता जी : जी