आप आकाश हो - You are the universe itself
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आप आकाश हो - You are the universe itself
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प्रभु जी : पूछ सकते हो जैसे रश्मि जी के पास तो प्रश्न है रश्मि जी आप पूछो तो जरा
रश्मि जी : प्रभु जी पता नहीं प्रश्न तो आज मैं कुछ सोच के आई थी लेकिन मैं भूल गई मुझे याद नहीं आ रहा आज मैंने अपने वो तो मैंने ऐसे प्रभु जी जब सामने आते हो सब भूल जाते हैं।
प्रभु जी : हां ये एक्सजेक्टली आपने ही सही कहा। ये बढ़िया है। ये सबसे अच्छा बोला है। तो प्रभु जी ने बोला मैं हूं करके प्रभु जी ही है। डमरू वाले टिमबर गीता वाह वाह वाह आपकी आवाज सुन लिया वो भी बहुत अच्छा वो आनंद दे गई सही बात है आपकी
रश्मि जी : आपने इतना ही पूछा मैं तो प्रश्न ही भूल गई प्रभु जी क्या-क्या करते हो कैसी-कसी लीलाएं करते हो आप भूल जाते हैं
प्रभु जी : मेरी लीला समझ में लगोगे तो फिर ज्ञान नहीं मिलेगा।
रश्मि जी : ठीक है प्रभु जी नहीं नहीं समझेंगे फिर
प्रभु जी : देखो इसका मतलब क्या है कि जैसे हम लोग पुराण सुनते हैं कथा सुनते हैं सुनते हैं ना हम उसी में उलझ जाते हैं और वो ऐसा करता था वो ऐसा करता था हम वहीं पे उलझ जाते हैं ये मतलब ऐसा ऐसा मतलब कुछ भी ऐसा ऐसा नहीं है जो भी करो सब ऐसा लेकिन समझो बात को और खुद को समझ जाओ। खुद को अर्थ क्या है? अब सब लोग क्या समझते हैं कि हां मुझे तो पहचान है। मैं खुद को समझता हूं। मैं हूं मुझे ये है ये है। सारे वो मन बुद्धि है। आप नहीं हो। आप मन बुद्धि से परे हो। बस उसको जानो एक बार। उसके बाद हो जाएगा सारा। एकदम इजीली है। इजी तो इतना इजी है कि अब तो क्या बताएं। बस छोड़ दो। वो वो सो भी एक प्रवचन में मैं सुना था। वो क्या बोलता था कि ध्यान में बैठ रहे हो ना छोड़ो छोड़ो पहले तो मैं नहीं समझता था कि छोड़ो छोड़ो का अर्थ क्या है छोड़ो का अर्थ जो है हम जकड़ते हैं ना अपने बॉडी को ध्यान में बैठते समय जैसे कहीं पे हम लगते हैं हाथ में हो गया पैर में हो गया मुठ में हो गया है ना श्वास प्रवास में हो गया हम जकड़ के रहते हैं सब चीज को छोड़ो तो आप तो आकाश हो अब पता चलेगा कि आप आकाश हो ये बॉडी आपके लिए दी गई साधन है जैसे बॉडी को ढोकने के लिए छोपने के लिए आपको देता है वस्त्र। उसी तरह उस आकाश को छोपने के लिए आपके लिए वस्त्र दिया है। ये शरीर अब हमारी वस्त्र बोलता नहीं है। है ना? तो लोग समझते हैं यह निर्जीव निर्जीव और सजीव अलग बात है। लेकिन जितना आपके पास होश है चेतन है वह सारे मिट्टी में भी है। आपके वस्त्र में भी है। और आपकी वस्त्र भी हम लोग बोलते हैं ना हम परचेज किया ये किया नहीं तय होता है। आपकी खानपीन जान सब तय होता है। आपकी दिनचर्या के साथ आपने जैसे बीज कोकी वैसे ही आपको मिलता है। एकदम प्राकृतिक स्वरूप है। तो वो भी
रश्मि जी : वस्त्र भी तो प्रभु जी वस्त्र भी तो कपास से बनता है। पौधों से ही आता है।
प्रभु जी : तभी तो वस्त्र बनते हैं।
रश्मि जी : तो पंच तत्व में नहीं है क्या?
प्रभु जी : पंच तत्व भी है। वस्त्र भी पंच तत्व तो सब चेतन ही है।
रश्मि जी : चेतन है। बिल्कुल। हम तो प्रभु जी हम यह कह सकते हैं कि पांचों तत्व तो हमारे अंदर है। हमें बस केवल आकाश तत्व को ही पकड़ना है। उसी की उसी की खोज में
प्रभु जी : हां पांच तत्व में आकाश तत्व भी एक तत्व है।
रश्मि जी : जी
प्रभु जी : हम उस तत्व को नहीं जानते जो आकाश तत्व है। समझ रहे हो? हम एक पिंजरे में बंद हो गया। जैसे हम बॉडी में बंद हो गया ना पिंजरा हमारा। तो ज्ञानी के हिसाब से मत सोचो कि ये वाणी ये हैबिट ये हुआ ये नहीं पिंजारे में बंद हुआ इसका अर्थ क्या है कि आप अपनी बॉडी से इलावा सोच ही नहीं सकते आप अलग हो पेड़ भी आकाश से मेरे आगे पेड़ है मैं अभी यहां देख रहा था वो 10 लोग उधर बैठे थे उसको देख के मुझे अच लगा इन लोग को जाके बताऊं कि भैया तू तो बॉडी नहीं आकाश बोलूं तो इन लोग पागल हो जाएंगे अभी राजेश को यही बोला था
रश्मि जी : जी
प्रभु जी : है ना अब ये चीज समझ तो ये समझ ये ज्ञान है। अंतिम ज्ञान बोलते हैं। आप आकाश स्वरूप हो। आप जीवंत दो और हमेशा जीवंत दो। अब जीवन भी हम कैसे सोचते हैं? हम बॉडी में आया और अभी आज की दिनचर्या जैसे हम जी रहे हैं। इसको जीवन सोचे। ये जीवंत नहीं है। ये हमारी दिनचर्या है। भला आप बचपन थे फिर वो हो गए बूढ़ा हो गए। ये आपकी दिनचर्या के अंदर आने वाली चीज है। वो जीवन वो तो तंत्र है जीवन। अब तंत्र तो आपकी बड़ी रहे ना रहे हमेशा रहेगा। क्योंकि ब्रह्मांड स्वरूप है ना। ब्रह्मांड तो एक ही है। जैसे हम बोला था ना कल भी कि वो समुद्र में पानी तो एक ही है ना। समुद्र एक ही है। लेकिन हिस्सा हिस्सा तो अलग-अलग है ना। है ना? एक नदी बहती है। कहां से कहां तक पहुंचती है? वो नदी एक ही लगता है। नहीं एक ही लगता है ना। कहां से कहां तक पहुंचता है नीचे? नदी दो है। नहीं है। एक ही है। लेकिन वो एक है। नहीं हर जगह वो अनेक है। ऐसे ही हमारी ब्रह्मांड चल रहा है और हम भी ऐसे चल रहे हैं। यह ध्यान और साधना से मिलेगा ज्ञान। प्रणाम जी प्रणाम। कुछ प्रश्न है तो पूछिए।
रश्मि जी : जी प्रभु जी तो ये प्रणाम प्रभु जी ये मतलब आकाश को मतलब केवल आकाश का खुलने का मतलब है केवल ध्यान और प्रणाम और बाकी कुछ नहीं।
प्रभु जी : हां वो जानने के लिए पहले अंतर आकाश खुलेगा। अंतकाश मतलब आंख बंद करने के बाद आपको यह लगेगा कि बाहर के आकाश और अंदर के आकाश आंख बंद करने के बाद एक ही लगेगा तब वो अंतकाश खुल गया। अब उसके बाद कुंडलिनी लेगी और वो कुंडलिनी ही आपको वह बताएगा कि असली कुंडलिनी आप ही थे। यह अजीब है।