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सम्राटों का सम्राट और आश्चर्य

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सम्राटों का सम्राट और आश्चर्य

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Prabhuji : आज ना बात क्या हुई थी आज सम्राटों की सम्राट से बात स्टार्ट हुई थी है ना पहले तो सम्राट सम्राट आज सुबह राजेश्वर में बैठा था तो उधर दो घंटे का सत्संग हुआ था तो उस

राजेश : हां वही

Prabhuji : बाद में बता रहा हूं आप सुन वहां पे बैठे थे दो लोग तो उसको बताया कि राजेश तुम्हें पता है ज्ञानी लोग तो सम्राटों का सम्राट होते हैं तो सम्राट क्यों नहीं बनते तो बन सकते थे राजा बन सकते थे, मंत्री बन सकते थे तो क्यों नहीं बनते? उनको तो ज्ञान है। वो तो जाके बन सकते हैं। तो बनते नहीं है वो। लेकिन वो है सम्राटों का। अब उस टाइम हम सत्संग में एक बार अनुभव ज्ञान के हिसाब से सम्राटों का सम्राट बन चुके सब लोग और उस टाइम मैंने बनाया था और आप लोग को अनुभव आ गया था कि सम्राटों का सम्राट का अनुभव क्या होता है अब उस अनुभव में अनुभव तो मिला लेकिन क्या सच में आप जहां के मंत्री बन सकते हो वो ज्ञान तो है नहीं तो आप सम्राटों के सम्राट नहीं है सम्राटों के सम्राट का अनुभव है

राजेश : हां

Prabhuji : उसको ये हो सकता है अब ये कब तब होगा तब होता है वो सम्राटों के सम्राट अगर वो चाहे बन सकता है लेकिन उसको ये पता है ना उसको ज्ञान होकर भी वो भी तो वही जाना पड़ेगा लड़ना पड़ेगा का फिर वही वही जैसे चलता है होता तो वैसे ही है बस उसको ज्ञान है तो फिर उसको दिक्कत तकलीफ को कारण वो नहीं जाता तो क्या आगे का वो सुख नहीं लेगा नहीं प्राकृतिक स्वरूप रस्ते भी आ रहा है तो उसको पता है ये चीज तो उसका ही है ना तो उस चीज को वो पकड़ के पकड़ जाएगा। अगर उसको पकड़ते पकड़ते उसको राजा बनना है तो जाके राजा भी बनेगा। वो राजा है तो राजा ही रहेगा। है ना? और आगे जाना चाहता है प्राकृतिक स्वरूप उसको ले जाए तो ले जाता है। तो मन बुद्धि इस दोनों पहलू को नहीं समझते। मनु बुद्धि क्या समझता है? नहीं अब उसको वैराग्य आ गया इसलिए वो सम्राट हो गया। अब उसको नहीं चाहिए। अब उसका मन मर गया। अब उसका वो है नहीं वो सम्राटों का सम्राट नहीं है वो ज्ञान के साथ अगर वो ज्ञान है वो चाहे बन सकता है तब ये होता है अभी सम्राटों का सम्राट कब बनता है राजेश अब आ गया बात यहां पे अभी सम्राटों का सम्राट वो है जो आश्चर्य में जीता है तो फिर आगे आश्चर्य क्या है आश्चर्य ये चीज है जो चीज पता होकर भी पता नहीं है बस इतना है आश्चर्य का अर्थ अब इसको तो समझे जैसे हम खानपीन खाते हैं और हम चलते हैं। हमको पता है खाना खाते हैं, मुंह से चबाते हैं। पेट जाता है, ये जाता है, ये जाता है और हमारे शक्ति आता है तो हम चलते हैं। हमको पता है। अब ये पता है। अब ये पता होकर भी जिसको ये आश्चर्य लगे ना अब वो चीज वो जान पाएगा। उस दशा में सम्राटों का सम्राट की दशा में वो पहुंच पाएगा। क्योंकि अब उसको लगा हां खाना खाने के बाद तो खा रहे हैं वही खाना पचा के हमारे काम हो रहा है। ये हमको जानते हैं। ये जानकर जब आश्चर्य लगेगा घटेगा आश्चर्य हर चीज आश्चर्य लगेगा। जो चीज हम जान रहे हैं वो भी आश्चर्य स्वरूप सुबह होता है। सूर्य उदय होता है। आश्चर्य नहीं है। सुबह ही सूर्य उदय होता है। है कि नहीं? हर चीज कितना परफेक्शन से चलता है। कौन मना के कह के गया है? आश्चर्य नहीं है क्या? हम मतलब हर जगह जाते हैं ऑफिस जा रहे हैं। अरे देखो तो ऑफिस जा रहे हो आश्चर्य नहीं है क्या बड़ी चिल रहा है। है ना? अब जिसको जिस डायमेंशन में समझ दे ले चला मतलब आश्चर्य यहां पे खोजना जाने की जरूरत हर चीज में आश्चर्य उसको जब ये पता चलेगा जब उसको आश्चर्य लगेगा तब वो बनेगा आचार्य। ये सत्संग बात है। अब जब वो आचार्य हो गया उसको पता चला तो क्या वो आश्चर्य में जिएगा नहीं वो मन बुद्धि में भी जी सकता है लेकिन वो थोड़ी देर के बाद आश्चर्य में आके रह सकता है। है ना वो आचार्य अब जो आश्चर्य के साथ जीते हैं वो ब्रह्मचर्य हो गए। अब आश्चर्य पता चला तो हर चीज को आश्चर्य स्वरूप मैं खाना खा रहा हूं। तो कैसे हो रहा है मतलब वो हर चीज अब वो प्रेजेंट भी आने लगा सूक्ष्म भी हो गया प्रेजेंट में भी आने लगा प्रेजेंट में वो प्रेजेंट की ओर है बॉडी में कोशिका में कोशिका के अनुभव में आने लगा अब हर चीज आश्चर्य आश्चर्य में जब जिएगा वो खुद आश्चर्य स्वरूप होगा दर्शन के बाद स्वरूप हो जाएगा